January 24, 2018

बिहार में उर्दू की बदहाली का जशन

अशरफ असथानवी

बिहार  की  दूसरी सरकारी  भाषा उर्दू  की स्थिति अत्यंत ही दयनीय है । उर्दू के कानूनी और व्यावहारिक कार्यान्वयन के लिए अधिकृत  मंत्रिमंडल  सचिवालय विभाग का उर्दू निदेशालय उर्दू की बदहाली का जश्न मना रहा है। इस दो दिवसीय समारोह के गवाह राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी बने। इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने एक बार फिर अपना 2009 का  अपना पुराना राग अलापा कि बिहार के स्कूलों  में उर्दू की शिक्षा की व्यवस्था की जायेगी । लेकिन कैसे जवाब इस बार भी नहीं मिला। मुख्यमंत्री ने उर्दू के व्यावहारिक कार्यान्वयन के लिए 400 उर्दू  कर्मचारियों की नियुक्ति की घोषणा भी की। जो उनके पूर्ववर्ती पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी द्वारा 1765 उर्दू कर्मचारियों की नियुक्ति के फैसले का मजाक उड़ाने के बराबर था। मुख्यमंत्री ने उर्दू के  लेखकों, कवियों और साहित्यकारों को पुस्तकों के प्रकाशन हेतु बहुत ही तुच्छ सी राशि प्रदान करके वाहवाही लूटने की कोशिश की मगर इस जशन के दौरान ही उनकी सरकार द्वारा 26 मार्च को राजभाषा विभाग  के तहत हिंदी  के साहित्यकारों , कवियों और लेखकों को लाखों रुपये का पुरस्कार प्रदान करके उर्दू के प्रशंसकों और उर्दू प्रेमियों को  उनकी औकात बता दी है।

कहने की परम आवश्यकता नहीं कि उर्दू के बड़े पुरस्कार का सिलसिला विगत कई वर्षों से तकनीकी कारणों का बहाना बनाकर बंद रखा गया है। मगर हिंदी भाषा और साहित्य का पुरस्कार जो उर्दू की तुलना में बहुत अधिक बड़ा और कीमती है इस का वितरण  प्रत्येक वर्ष निरंतर जारी है। जो सरकार और राज भाषा अंतर्गत उर्दू निदेशालय के निदेशक की विफलता को दर्शाता है और सरकार के उर्दू के साथ उसके सौतेले व्यवहार को भी  स्पष्ट करता  है।

दो दिवसीय जशन उर्दू तो समाप्त हो गया, परन्तु इस कार्यक्रम के आयोजन पर उर्दू का दर्द रखने वाले लोगों में कई प्रशन छोड़ गया . मुख्यमंत्री ने अपने उद्घाटन भाषण में उर्दू आबादी को बहुत ही निराश किया . मुख्यमंत्री ने खुले शब्दों में कहा कि बिहार में योग्य उर्दू शिक्षक नहीं हैं , बहाली का मामला न उठाकर उर्दू की पढ़ाई पर ध्यान केन्द्रित किया जाए , जिस का वहां उपस्थित उर्दू प्रेमियों ने तालियों की गड़गड़ाहट से स्वागत किया . हालाँकि मुख्यमंत्री को उसी समय अपने व्यक्तव को वापस लेने का अनुरोध करना चाहिए था , लेकिन जशन के नशे में मस्त इन उर्दू प्रेमिओं ने कुछ भी नहीं किया. मुख्यमंत्री उर्दू वालों को मायूस करके चलते बने .

जबकि यह स्थापित सत्य है कि बिहार में जमीनी स्तर पर उर्दू की स्थिति अच्छी नहीं है। स्कूलों में उर्दू शिक्षक नहीं हैं। उर्दू शिक्षक के उम्मीदवार हजारों टीईटी पास और प्रभावित बेरोजगार युवक सड़कों की धूल फांक रहे हैं। वो जब भी अपनी मांगों के प्रति मुखर होते हैं, उन पर पुलिस के डंडे चलने शुरू हो जाते हैं। शिक्षा मंत्री उनकी बात नहीं सुनते। जन प्रतिनिधियों का प्रयास भी सफल होता नहीं दिख रहा है। दूसरी ओर उर्दू के प्रचार-प्रसार के नाम पर सरकारी तंत्र ‘‘दो दिवसीय विश्व उर्दू कॉन्फरेंस’’ और ‘‘दो दिवसीय जश्न-ए-उर्दू’’ का आयोजन कर के राज्य की उर्दू आबादी में उर्दू के विकास के प्रति अपनी व्यक्तिक प्रतिबद्धता के प्रचार में लगे हैं।

21-22 मार्च, 2017 को बिहार उर्दू अकादमी के सचिव मुश्ताक़ अहमद नूरी द्वारा अकादमी के कान्फ्रंस हॉल में‘‘दो दिवसीय विश्व उर्दू कॉन्फरेंस’’ आयोजित कराया गया है। इस पर अकादमी के एक सदस्य और प्रतिष्ठि साहित्यकार ने ही उनके इस रवैइये पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा है कि अकादमी के सचिव, उर्दू के विकास के लिए सरकार की अनुदान राशि  के उपयोग में मनमानी करते रहे हैं। उसी तरह उर्दू निदेशालय के निदेशक इम्तेयाज अहमद करीमी भी उर्दू के विकास तथा कार्यान्वयन के सरकारी एजेंडे से अलग राज्य स्तर पर केवल अपनी वाह वाही कराने और सेल्फ ब्रांडिंग के प्रयास में लगे हुए हैं।

मुख्यमंत्री के परामर्ष से, राज्य मं उर्दू के बहुआयामी विकास के लिए, तमाम पहलुओं पर विचार करने तथा एक निष्चित अवधि में सरकार को विस्तृत और व्यवहारिक रिपोर्ट प्रस्तुत करने के के लिए एक उच्च स्तरी समिति के गठन का भी निर्णय हुआ था। मगर समीक्षा बैठक के बाद उसकी प्रोसीडिंग पर कार्रवाई की ओर उर्दू निदेशालय ने मुड कर भी नहीं देखा। बैठक की प्रोसीडिंग पिछले 15 महीनों से फाइलों में ही पड़ी हुई है।विगत पांच वर्षों से उर्दू साहित्यकारों को मिलने वाला बड़ा अवॉर्ड बंद है, जबकि हिंदी वालों को प्रत्येक वर्ष ये अवार्ड प्राप्त हो रहे हैं।

25  और 26  मार्च को २ दिवसीय जश्न-ए – उर्दू के  नाम पर लाखों रूपए  पानी की तरह बहाए गए , एक विशेष समूह का क़ब्ज़ा उर्दू निदेशालय पर हो चूका है, इस तरह के आयोजन का क्या अवचितय है। ये बुधिजिव्यों में चर्चा का विषय बना हुवा है . उर्दू निदेशालय के  निदेशक अपने व्यक्तित्व को चमकाने और सरकारी राशि का बंदरबांट करने में महारत रखते हैं . उर्दू आबादी में जशन को लेकर काफी आक्रोश व्याप्त है .

विदित हो कि 4 जनवरी, 2016 को मुख्यमंत्री नीतीष कुमार की अध्यक्षता में हुई एक उच्च स्तरीय विभागीय समीक्षा बैठक में निर्णय लिया गया था कि राज्य की उर्दू आबादी के भाषायी हितों की रक्षा के लिए वह सब कुछ किया जाय जो जरूरी है। बैठक के बाद सूचना एवं जनसंपर्क विभाग की ओर से जारी प्रेसविज्ञप्ति  के अनुसार उस बैठक में यह भी निर्णय लिया गया था कि राज्य के पबिलक कंसर्नड सभी कार्यालयों जैसे राजभवन, मुख्यमंत्री सचिवालय के साथ साथ सभी राज्य आयोगों सभी थानों, सभी अंचल कार्यालयों, सभी प्रमंडलीय कार्यालयों आदि में उर्दू/हिन्दी अनुवाद सेल की स्थापना की जायेगी तथा आवशयक संख्या में पदाधिकारियों और कर्मचारियों की नियुक्ति की कार्रवाई की जायेगी। लेकिन इस महत्पूर्ण निर्देश को उर्दू निदेशालय के निदेशक ने रद्दी की टोकड़ी में डाल दिया |

ऐसे में जश्न -ए -उर्दू मानाने का किया अवचितय है , अब वक़्त आगया है कि उर्दू की रक्षा के लिए उर्दू प्रेमी सड़कों पर उतरें और उर्दू माफियाओं के विरुद्ध जन आंदोलन छेडें।

 

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