August 22, 2017

सच कह दूं हे ब्राह्मण …

कासिम सैयद
मुस्लिम पर्सनल लॉ को लेकर सरकार के इरादों किसी ढके छिपे नहीं हैं और इस समय राजनीतिक रूप से सबसे कमजोर तबके न किसी को जरूरत है और न ही उनके दुख दर्द जानने की। विपक्षी पार्टियां अपने हिस्से वितरण समेटने की कोशिशों में लगे हैं। खुद के अस्तित्व होंठ दम है, इसलिए वह किसी और के बारे में क्यों सोचेंगे। वैसे भी हम धर्मनिरपेक्ष राजनीति पाखंड, प्रवंचना और मक्कारी के बदातरात महसूस नहीं किया और न ही मुस्लिम युवकों में पाई जाने वाली बेचैनी, चिंता और निराशा महसूस कर सके हैं। जब गयोमाता नाम पर किसी पहलू खान और लोजहाद बहाने गुलाम मोहम्मद के निर्मम हत्या की वारदातें सामने आती हैं तो दिल उछल कर गले में आ जाता है, क्योंकि ऐसे गंभीर घटनाओं के बाद भी सन्नाटा इतना गहरा है कि रोम रोम धड़कने लगता है । प्रत्येक अपने हिसार में कैद और सरमसतयो में इतना डूबा है कि द्वारा और पूर्वावलोकन में क्या क़यामत बरपा रही है यह चिंता ही नहीं। अल्लाह रक्षक है, सोचकर ख़राो की गति बढ़ जाती है, इस उदासीनता कहें या बेगैरती डर कहें या वकील, कोई नाम दें, बंधन, वफादारी निभाने का भी श्रद्धांजलि में कहीं आक्रामक नहीं लगती बल्कि कभी ऐसा लगने लगता है कि निगाहें स्वामी के चेहरे पर रहती हैं कि ऐसा न हो कि कभी जोर निकालने में ‘प्राचीन खातिर’ न गए हों।
सरकार के नापाक इरादों के साथ हमारा व्यवहार किया जाना चाहिए इस पर सहमत नहीं हो सकता। एक वर्ग ममोलह को शाहबाज से लड़ाने पर मिस्र तो दूसरा न्यायिक युद्ध तक मामला सीमित रखने के पक्ष में, स्थिति उत्साह के साथ होश और प्रक्रिया और सदहतसाबय मांग हैं, उस पर किसी का ध्यान नहीं है। जब मुस्लिम महिलाओं की ‘मरलोमेत’ का राग भेरोय गाया जाता है तो हमारे द्वारा भारतीय महिलाओं की मरलोमेत के किस्से सुनाए जाते हैं।
मुट्ठी भर लोगों की नादानी और गईरासलामी हरकतों से इस्लाम और मुसलमानों को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की जा रही है तो दोष हमारा है। शाहबानो मामले के परिणाम जीत की जगह घाटे का सौदा साबित हुए। राजीव गांधी सरकार ने मुसलमानों के देशव्यापी आंदोलन के दबाव में आकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अस्वीकार करके मुस्लिम महिला बिल पास किया तो दूसरी ओर साम्प्रदायिक को खुश करने के लिए बाबरी मस्जिद पर लगा ताला खुलवादया, जिसका अंजाम बाबरी मस्जिद की शहादत पर हुआ। और अब यह आशंका जताई जा रही है कि तीन तलाक के मामले में न्यायिक लड़ाई हारने पर जो संभावना है, क्योंकि कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने मुकदमा आधार बहुत कमजोर रखी है, बोर्ड के सामने आंदोलन चलाने के अलावा जाहिर और कोई रास्ता नहीं रहेगा तो क्या इतिहास खुद को फिर एक बार दोहराए जाएगा और प्रदर्शन के रूप में कहीं हम बाबरी मस्जिद को तो नहीं खो देंगे, क्योंकि सरकार की नीयत में खोट है। इस बार लड़ाई प्रकृति अलग है। केंद्र में ऐसी सरकार सत्ता है जो इस वर्ग को सबक सिखाने के मूड में है, जिसने पृष्ठ दिन से उसके खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। शाहबानो मामले के बाद से िकोबत बक्से के दरवाजे खुल गए थे। उक्त बिल मुस्लिम पुरुषों को कोई लाभ नहीं हुआ, लेकिन महिलाओं के लिए अदालतों के दरवाजे अधिक उछला। फिर गैर व नुफ़्क़ा संबंधित मामलों की बाढ़ आ गई। विभिन्न अदालतें एक के बाद एक विरोध व्यवस्था और पर्सनल लॉ के खिलाफ निर्णय देती रहें। कीबोर्ड हाथ पर हाथ बांधे खड़ा रहा। अगर सायरा बानो, तीन तलाक, हलाला और आवृत्ति वैवाहिक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट न आती तो शायद हमारी आँखें भी न खुलतें। त्रुटियों को स्वीकार करने से आदमी बड़ा बनता है, दूसरों के द्वारा तुरंत पत्थर उछाल कर और तान व तशनीि का सहारा लेकर केवल मानसिक दिवालियापन ही व्यक्त हो सकता है। दिलशाद बेगम नामक तलाकशुदा महिला ने गैर व नुफ़्क़ा का मुकदमा किया। सेशन कोर्ट ने पति की इस दलील पर कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत वह गैर व नुफ़्क़ा का मुकल्लफ़ नहीं, मुकदमा खारिज कर दिया। दिलशाद बेगम मुंबई हाईकोर्ट पहुंची जिसने जनवरी 2007 में इस फैसले को उलट दिया। न्यायमूर्ति पी एच रपले ने अपने फैसले में कहा कि पूर्व पति ने तलाक के कारणों, सुलह के लिए मध्यस्थों की नियुक्ति और सुलह विफलता जिसे कुरान आवश्यकताओं को पूरा नहीं किया इसलिए महिला गैर व नुफ़्क़ा की हकदार है। इस पर कोई विरोध नहीं हुआ, न ही चुनौती दी गई। कुछ अदालतों द्वारा लगातार पर्सनल लॉ विरोधी निर्णय आते रहे। ऐसा ही निर्णय 2001 में मुंबई हाईकोर्ट और 2002 में सुप्रीम कोर्ट ने दिया। 2 जनवरी 2003 को दिल्ली के ट्रायल कोर्ट ने कहा कि कुरान विशिष्ट स्थिति में एक से अधिक शादी की इजाज़त दी है। 10 फरवरी 2015 को सुप्रीम कोर्ट के दोनों खंडपीठ ने फैसला सुनाया था कि आवृत्ति वैवाहिक इस्लाम अभिन्न अंग नहीं है और कुरान में दी गई अनुमति को कुरान का दर्जा नहीं दिया जा सकता। नवंबर 2015 में गुजरात हाई कोर्ट ने अपने फैसले में मुस्लिम पर्सनल लॉ में बदलाव की वकालत करते हुए कहा कि पत्नी की सहमति के बिना एक से अधिक शादी और एकतरफा तलाक संवैधानिक सिद्धांतों के खिलाफ है। कुरान निजी स्वार्थों सेक्स संतुष्टि के लिए एक से अधिक शादी के खिलाफ है और मुसलमान इस बात को सुनिश्चित करें कि अवांछित गलत गतिविधि औचित्य कुरान गलत व्याख्या और व्याख्या से बचें। समय-समय पर न्यायिक फरमोदात आते रहे हैं, जो बताते हैं कि शरई आदेश के संबंध में न्यायालय निर्णय देती रही हैं जो हमें विचार और सुदअहतसाबी भी आमंत्रित हैं। अदालतें आखिरी उम्मीद होती हैं लेकिन वह भावनाओं में नहीं, मुकदमा के दौरान पेश सबूतों, दलीलों और ठोस दस्तावेज़ प्रकाश में फैसला सुनाते हैं, हालांकि इस अनुभव निराशाजनक रहा है, इसमें अदालतों का दोष है या अनुयायियों का, यह महत्वपूर्ण सवाल है, क्योंकि हम अधिकांश युद्ध हारते आए हैं। व्यवस्था में हस्तक्षेप का मामला हो या बाबरी मस्जिद विवाद के सबसे लंबे समय तक लड़ाई हम कानूनी और न्यायिक युद्ध में हार के सबसे लंबे समय तक रिकॉर्ड रखते हैं। कई बातें धारा राज में ही अच्छी रहती हैं अन्यथा पर्दा नशीनों नाम सामने आने से शर्मिंदगी होती है।
दरअसल जो लड़ाई बोर्ड अपने समाज में छीड़नी चाहिए थी वह उसने सरकार के खिलाफ छीड़दी और पर्यावरण लगातार टकराव वाला बनता जा रहा है। सरकार ने बड़ी चालाकी से तलाक तलातह को राजनीतिक मुद्दा बना दिया और बोर्ड इस खेल में जाने अनजाने में फंस गया। शाहबानो मामले में एक ताआभाना था इससे सबक नहीं लिया गया। इस समय पारिवारिक नियमों पर ध्यान दिया गया होता और उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई योजना बनाया जाता तो शायद यह स्थिति प्रदान नहीं आते। मुसलमानों ने कुरआन की शिक्षाओं का पालन करना छोड़ दिया है। ये बातें सिर्फ किताबें होकर रह गई हैं। विद्वानों ने अपने भाषणों में पारिवारिक नियमों को समझना कोई जरूरत ही नहीं समझी और अब जबकि पानी सिर से ऊपर होकर गुजर रहा है, तीन तलाक देने वालों का सामाजिक बहिष्कार का ऐलान किया है। इसका मतलब यह है कि बोर्ड कहीं न कहीं महसूस कर रहा है कि तीन तलाक गीरशरिी और शातिर समारोह, जैसा कि मौलाना विनती अल्लाह रहमान ने अपनी एक किताब में साफ तौर पर कहा है। अब सवाल यह है कि क्या बोर्ड से खुद कोई रास्ता निकाल सकता है या नहीं। न्यायिक निर्णय अगर खिलाफ आएगा तो अगला व्यावहारिक कदम क्या होगा। आंदोलन चलाया जाएगा, शाहबानो केस की तर्ज पर सार्वजनिक अहतजाजात व्यवस्थित होगा और सरकार को मजबूर किया जाएगा कि वे कोर्ट के फैसले को पलट कर कानून करे, क्योंकि बोर्ड ने हलफनामे में कहा है कि कानून का अधिकार अदालत नहीं संसद को है। क्या हम इस बात के लिए तैयार हैं कि संसद कानून करे? क्या यह आवश्यक है कि सरकार हमारी भावनाओं व शरीयत बाध्य रहे जबकि उसका मोड और तेवर कुछ और ही कहते हैं। क्या लो और दो का कोई फॉर्मूला सामने आएगा? क्या हम मानसिक रूप से टकराव के लिए तैयार हैं? इससे किसे राजनीतिक लाभ पहुंचेगा और मुसलमानों को क्या लाभ और नुकसान होगा। व्यवस्था बनाए रखने के लिए जान की कुर्बानी मांगी जाएगी। क्या देश और खुद मुसलमान इसके लिए पैसा है? मौजूदा गंभीर परिस्थितियों में यह संभावना है कि संसद इस तर्ज पर कोई बिल लाए। एक और पहलू है जिस पर साफ जवाब देने की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट ने किसी विशेष संप्रदाय को ध्यान रखकर फैसला सुनाया और एक साथ तीन तलाक को निषिद्ध तो इस फैसले के खिलाफ व्यवस्था माना जाएगा या खिलाफ पंथ? इस समय कैसा व्यवहार होना चाहिए और प्रति ंसह तलाक देने पर ही प्रतिबंध लगा दिया गया तब क्या तंत्र अपनाया जाएगा। जाहिर है ऐसे सभी सवालों मान्यताओं और काज्ात पर हैं, भगवान करे ऐसी स्थिति पैदा न हो और निर्णय हमारे पक्ष में आए, लेकिन न आने की स्थिति में क्या होगा? यह अग्रिम विचार करने की जरूरत है। अन्य समाज की तरह मुस्लिम समाज भी व्यक्ति की स्वतंत्रता और विकल्प बेजा इस्तेमाल की प्रवृत्ति बढ़ रही है। मुस्लिम समाज केवल वही नहीं है जो मदरसों में विद्यार्थी हैं या मदरसा के शिक्षित है, वह लोग जिन्हें दीन हुआ छूकर नहीं गई लेकिन मुस्लिम समाज का हिस्सा हैं। बेन धर्मों शादियों की प्रवृत्ति अब यहाँ भी अजनबी नहीं रहा। शादी ब्याह में बेजा अपव्यय और शाह ख़रची अब विद्वानों यहाँ भी उदारता के साथ देखी जा सकती है। दहेज लेनदेन कोई अछूता नहीं, अब तो दहेज में मदरसा दिए जाने की खबरें आने लगी हैं। आखिर इन समस्याओं को कब पता किया जाएगा, केवल आदेश जारी करने से काम नहीं चलने वाला। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की नैतिक स्थिति भी कमजोर होती जा रही है, क्योंकि ऐसे तत्वों का बोलबाला हो गया है जो राजनीतिक महत्वाकांक्षा रखते हैं।
तूफान आने से पहले कोई तंत्र तैयार करने आत्मनिरीक्षण पर ध्यान देने और व्यापक बनियादीं पर न्यूनतम साझा कार्यक्रम बेहद जरूरत है। जो भी मुसलमानों के प्रतिनिधि मंच हैं, चाहे कोई नाम हो, किसी देश के हों लेकिन उनका विश्वास और प्रतिष्ठा है, महत्वपूर्ण सत्ता हस्तियों जो किसी संगठन या संस्था से संबद्ध नहीं है, लेकिन राष्ट्रव्यापी प्रभाव रखती हैं क्या इतनी क्षमता नहीं कि मिल्लत मज़लूम की खातिर अस्थायी यद्यपि दो तीन मुख्य मुद्दों पर एक साथ बैठ जाएं, उनके टूटे हौसलों ऊर्जा दें और मोराल को उठाना, राष्ट्रव्यापी दौरे पर निकल कर ढाढस बंधाएँ, स्थिति बहुत गंभीर हैं और यह किसी को नहीं बख़्शने वाले। ऐसा न हो कि यह बात समझने में बहुत देर हो जाये।

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