चलती ट्रेन में एक और महिला का  बलात्कार: दोषी हम और हमारा समाज

Views: 5

शम्स तबरीज़ कासमी

मेरठ के लसाड़ि गेट की  रहने वाली एक मुस्लिम महिला इलाज कराने के लिए लखनऊ जाना चाहती  हैं, वह लखनऊ चंडीगढ़ एक्सप्रेस में सवारहोती हैं, रास्ते में उसकी तबियत बिगड़ती जाती है, बिजनौर क  चानदपोर स्टेशन पर  कमल शुक्ला नाम का एक रेलवे पुलिस उसकी मदद  करता है  और इसे सेट देने  के नाम पर विकलांग  कोच में ले जाता, वहाँ पहुँचने के बाद वह पुलिस दरिन्दा बन जाता, बंदूक की नोक पर सभी पुरुष यात्रियों को  कोच छोड़ने का आदेश देता है, दरवाजा बंद कर्क हैवानियत की सभी हदें पाकरके बीमार महिला की बलात्कार शुरू कर देता है, वह बीमार महिला चीखती हैं, चलाती हैं लेकिन उसकी आवाज  बेअसर  साबित होती है और पुलिस की वर्दी पहना हुआ देश का रक्षक चलती ट्रेन में उसकी इज्जत लूटना  शुरू अ कर देता, बिजनौर स्टेशन पहुँचते पहुँचते सैनिक दरिंदगी बीमार महिला का  सम्मान तारतार  कर देता  है, बिजनौर स्टेशन पर महिला को  आधा मृत और बेहोशी की स्थिति में उतारा जाता, जनता कमल शुक्ला पर भड़कती है, मौके पर मौजूद पुलिस उसे गिरफ्तार करके थाना ले जाती है, लेकिन थाने में कमल शुक्ला को सज़ा देने, उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के बजाय वीआईपी  सम्मान किया जाता  है, कुर्सी मेज लगाकर उसे शानदार खाना खिलाया जाता, मौके पर मौजूद पत्रकार जब यह सवाल करते हैं कि यह रेप का दोषी  है  तो जवाब मिलता है अभी  अपराध साबित नहीं हुआ, सोशल  मीडिया पर जारी संघर्ष और जनता की मांग के बाद कमल शुक्ला आज निलंबित करदयागयाहे।

दिसंबर 2012 में दिल्ली की धरती पर चलती बस में एक लड़की के साथ बलात्कार हुवा तो  पूर  दुनिया में हलचल मच गई, सरकार हिल गई, दिल्ली सहित पूरे भारत में महीनों विरोध का सिलसिला जारी रहा, रेप के अपराधियों के लिए देश का कानून बदला गया, फास्ट ट्रैक अदालत द्वारा निर्भया हादसे के अपराधियों को फांसी की सजा सुनाई गई।

एक मेरठ की  इस महिला की घटना है जिस  की इस्मत चलती ट्रेन में लूटी गई है, बीमारी की हालत में उसके साथ रेप किया गया है और यह दरिंदगी किसी आम आदमी ने नहीं, किसी मजनूं और  दीवाने  ने नहीं बल्कि पुलिस वर्दी पहने एक व्यक्ति ने की है लेकिन उसे कोई विशेष सजा नहीं मिली है, मुख्यधारा मीडिया में इस खबर का कोई जिक्र नहीं है, किसी राजनेता ने इसकी निंदा नहीं की है, यूपी और केन्द्रीय सरकार ने इस पर कोई संज्ञान नहीं लिया है आखिर क्यों?  किस वजा से ? और कौन है इसके लिए जिम्मेदार?

इसके लिए जिम्मेदार हम हैं, हमारा समाज है, हमारी सोसाइटी है , हमारी छोटी बड़ी संगठन हैं क्यों कि हम चुप हैं, सड़कों पर निकल कर हम विरोध नहीं किया है, अपनी बहन के समर्थन में हम कोई कदम नहीं उठाया  है, निर्भया दुर्घटना के अपराधियों की फांसी का फैसला महीनों के विरोध के बाद हुआ था, लगातार होने वाले प्रदर्शन के सामने प्रशासन, विधायिका और न्यायपालिका संविधान बदलने पर मजबूर हो गई थी, हम चाहते हैं कि मेरठ की रहने वाली हमारी इस मुस्लिम बहन को न्याय मिले, अपराधी अंजाम तक पहुँचे तो हमें  सोशल  मीडिया के बजाय वास्तविक दुनिया में कदम रखना होगा, सड़कों पर उतर कर विरोध करना होगा, ज़ुल्म की  शिकार महिला से अवगत करानाहोगा।

चलती ट्रेन में बलात्कार: दोषी हम और हमारा समाज इस समस्या समाज है, किसी धर्म और धर्म से इसका संबंध नहीं है इसलिए बिना किसी धार्मिक भेदभाव के हर किसी को आगे  आना होगा, हिन्दू-मुस्लिम सहित सभी समाज को मिल कर इस दरिंदगी  के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करना  होगी, न्यायपालिका और प्रशासन को समान दृष्टि से देखना होगा, हर अपराधी और रीपसट को  एक तरह की सजा देनी होगी, कानून और संविधान को  लागू समान रूप से करना होगा, मुस्लिम महिलाओं की इज़्ज़त तारतार  की जाये  या हिंदू महिलाओं की बहरसूरत  यह अक्षम्य अपराध है, रेपिस्ट  मुसलमान हो या हिन्दू वह दंडनीय है, इसलिए न्यायपालिका से लेकर प्रशासन तक को  इस बारे में बेदार करना होगा, निर्भया अपराधियों की तरह हर महिला की इस्मत तारतार करने वालों को फँसी के फंदे  पर लटकाना  होगा।

अंत की पंक्तियों में कमल शुक्ला की दरिंदगी कैमरे में  कैद करने  वाले उमेश का उल्लेख आवश्यक है जिस की तस्वीर  ने पुलिस वर्दी में छिपे दरिंदे अपराध को स्पष्ट रूप से अवगत कराया है, उमेश का यह मानना ​​है के बलात्कार का मामला हिन्दू और मुसलमान नहीं बल्कि समाज का  है, अगर किसी मुसलमान बहन के साथ  बलात्कार की जा सकती है तो हिन्दू  बहन के  साथ भी यह सब किया जा सकता है, इस्मत इस्मत है चाहे हिंदू बहन की हो यामसलमान बहन की

stqasmi@gmail.com