म्यांमारःपत्रकारों को मिली सच लिखने की सजा,रोहिंग्या मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसा की जांच कर रहे पत्रकारों को जेल

वसीम अकरम त्यागी: भारत से सटा हुआ एक देश है म्यांमार, यह देश बीते कई सालों से रोहिंग्या मुसलमानों के कत्ल ए आम के लिये सुर्खियों में है। विडंबना देखिये जिस देश में रोहिंग्याओं का जनसंहार हुआ है उस देश की कर्ता धर्ता आंग सांग सूकी को नोबेल पुरुस्कार मिला हुआ है। आंग सांग सूकी ने म्यांमार में लोकतंत्र की बहाली के लिये लंबे समय तक संघर्ष किया है। जब उन्हें नोबेल पुरुस्कार दिया गया उस समय भी वे जेल में थीं। अख़बारो में एक तस्वीर प्रकाशित हुई थी जिसमें एक कुर्सी पर आंग सांग सूकी की एक तस्वीर रखी थी, उसी तस्वीर को आंग सांग सूकी मानकर नोबेल पुरुस्कार प्रदान कर दिया गया। कुछ दिन बाद आंग सांग सूकी जेल से बाहर आ गईं और उन्होंने अपने आंदोलन में सफलता भी हासिल कर ली, वे म्यांमार को तानाशाही से लोकंत्र में ले आईं। म्यांमार में लोकंत्र की बहाली के साथ साथ रोहिंग्याओं का कत्ल आम शुरू हो गया। यह कत्ल ए आम समय समय पर होता रहा। बीते साल 2017 में छ लाख रोहिंग्या मुसलमान अपनी जान बचाकर बंग्लादेश में शरण लेने के लिये मजबूर हुए, और हजारों की संख्या में मार दिये गये। अब एक और दुःखदायी ख़बर म्यांमार से आई है। म्यांमार की एक अदालत ने समाचार एजेंसी रायटर्स के दो पत्रकारों को सात साल की सज़ा सुनाई है। इन दोनों पत्रकारों पर रोहिंग्या समुदाय के ख़िलाफ़ हुई हिंसा की जांच के दौरान राष्ट्रीय गोपनीयता क़ानून के उल्लंघन का आरोप है। वा लोन और क्याव सो ओ नाम के ये दोनों पत्रकार म्यांमार के ही नागरिक हैं। इन पत्रकारों को तब गिरफ़्तार किया गया जब ये कुछ सरकारी कागज़ात ले जा रहे थे। ये कागज़ात उन्हें कथित तौर पर पुलिस अफ़सरों ने दिए थे। दोनों पत्रकारों ने ख़ुद को बेगुनाह बताया है और कहा है कि पुलिस ने ही उन्हें फ़ंसाया है।और ठहरा दिये दोषी

इन दोनों पत्रकारों को पिछले साल दिसंबर में गिरफ़्तार किया गया था, तब से वे जेल में ही बंद हैं। 32 साल के वा लोन और 28 साल के क्याव सो ओ म्यांमार में रोहिंग्या समुदाय के 10 पुरुषों की हत्या की जांच कर रहे थे। इन 10 रोहिंग्या पुरुषों की हत्या सितंबर 2017 में उत्तरी रखाइन के इन-दिन गांव में कथित तौर पर सेना के ज़रिए की गई थी। इन दोनों ही पत्रकारों को उनकी रिपोर्ट प्रकाशित होने से पहले ही गिरफ़्तार कर लिया गया था। जो रिपोर्ट इन दोनों पत्रकारों ने तैयार की थी वह अपने-आप में एक बेहद दिलचस्प और असाधारण रिपोर्ट थी। इस रिपोर्ट को तैयार करने के लिए और भी दूसरे पत्रकार शामिल थे। इस रिपोर्ट को असाधारण इसलिए बताया गया था क्योंकि इसमें बहुत से लोगों के बयान शामिल किए गए थे, इनमें बौद्ध ग्रामीण भी शामिल थे जिन्होंने रोहिंग्या मुसलमानों की हत्या और उनके घरों में आग लगाने की बात क़बूल की थी। इस रिपोर्ट में अर्धसैनिक बल के जवानों के बयान भी थे जिन्होंने सीधा सेना पर आरोप लगाए थे। यांगून की अदालत में दोनो पत्रकारों पर फ़ैसले सुनाते हुए जज ये ल्विन ने कहा कि दोनों ही पत्रकार राष्ट्र को नुकसान पहुंचाने की मंशा से काम कर रहे थे। जज ने कहा, ”इस तरह ये दोनों ही पत्रकार राष्ट्रीय गोपनीयता क़ानून के तहत दोषी पाए जाते हैं।”
फिर लोकतंत्र कहां है ?

जिन दोनों पत्राकरों को म्यांमार की अदालत ने दोषी ठहरकार सजा सुनाई है, वे दोनों पत्रकार कह रहे हैं कि उन्हें न्यायपालिका पर भरौसा है, उन्हें लोकतंत्र पर भरौसा है। सवाल है कि उन्हें किस लोकतंत्र पर भरौसा है ? क्या उन्हें आंग सांग सूकी द्वारा बहाल कराये गए उस लोकतंत्र पर भरौसा है जिसने सत्ता में आने के बाद म्यांमार को रोहिंग्या मुसलमानों के कत्ल ए आम का केन्द्र बना दिया ? क्या उन्हें उस लोकतंत्र पर भरौसा है जिसने पत्रकारों से प्रेस की आजादी छीन ली और उनकी रिपोर्ट को ‘राष्ट्रीय खतरा’ बताकर उन्हें जेल में डाल दिया। इधर भारत में पांच लेखक/विचार/ एक्टिविस्ट जेल में डाल दिये गये, इन पर भी वैसा ही इल्ज़ाम है जैसे म्यांमार के पत्रकारों पर था। भारत मे जिन एक्टिविस्टों को जेल में डाला गया है वे आदिवासियों के अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे थे।

सवाल है कि जिस लोकंत्र में असहमती दर्ज कराने के एवज में जेल जाना पड़े फिर वह लोकतंत्र कहां है ? जिस लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करने का मतलब राष्टद्रोह बताया जाए क्या उसे लोकतंत्र कहा जा सकता है? 2014 के आम चुनाव के दौरान वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक टीवी चैनल को दिये इंटरव्यू में कहा था कि लोकतंत्र में एक छोटा सा बच्चा भी सवाल पूछने का अधिकार रखता है। मगर क्या मोदी के सत्ता में आने के बाद ऐसा हो पा रहा है ? टीवी पर बैठे एंकर के पास सिर्फ दो रास्ते हैं या तो वह मोदीनामे का जाप करे या फिर नौकरी छोड़कर चला जाये। सत्ता में आने के बाद उसूल कैसे धाराशायी हो जाते हैं ये लोकतांत्रिक शासकों को देखकर आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है। जिन आंग सान सूकी ने म्यांमार में लोकतंत्र बहाल कराया वही सूकी प्रेस की आजादी का गला घौंट रही हैं। जिन नरेन्द्र मोदी ने लोकतंत्र में सवाल पूछना जनता का अधिकार बताया उन्हीं के कार्यकाल में सवाल पूछने वालों को देशद्रोही कहा जा रहा है, धमकियां दी जा रही हैं, और तरह तरह से उन्हें बदनाम किया जा रहा है। ये उसूलों के धाराशायी होने की पराकाष्ठा है, लोकंत्र में हारकर नेता कुछ भी नहीं बदल सकते, लेकिन जीतने के बाद वही लोकतांत्रिक खुद बदल जाते हैं।
(लेखक युवा पत्रकार हैं, और नेशनल स्पीक न्यूज़ पोर्टल के कार्यकारी संपादक हैं)