मैं मुसलमान हूँ

अली हम्माद: मै मुसलमान हूँ, मै प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री,एमपी, एमएलए नही बन सकता, क्योकि मेरी तादाद कम है और जातिवाद ज्यादा, लेकिन मैं कलेक्टर, एसडीएम, तहसीलदार, कमिश्नर, एसपी, डीएसपी तो बन ही सकता हूँ।

लेकिन मै निकम्मा हूं, मुझे नेता नगरिया जैसा सीधा- सीधा खाने को चाहिए, जिसमे दो-चार आस-पास भाई-भाई करते हुए मेरे इर्द-गिर्द घूमे।
मुझ से घंटो पढ़ाई नही होती, अगर मैं पढ़ने लग गया तो चौराहों की रौनकें ख़त्म हो जाएंगी, जो कि मै होने नही दूंगा, मै पढ़ गया तो गुटखा, पाउच, शराब, चरस गांजा, तास पत्तियां छूट जायेंगी जो कि मै छोड़ना नहीं चाहता।

मै पढ़ गया तो मोहल्ले की रौनक कम हो जाएगी, दिन भर आवारागर्दी इन्ही मोहल्ले में ही तो करता हूँ मै, हां! काम नही है मेरे पास, लेकिन क्या फ़र्क़ पड़ता है, अल्लाह दो वक़्त की रोटी तो खिला ही देता है ना!

हां मै मुसलमान हूँ, और पैदा होते है एक सील ठप्पा लग गया था मेरी तस्वीर पर कि मै पंचर की दुकान खोलूंगा या हाथो में पाने पकड़ कर गाड़िया सुधारूँगा, या बहुत ज्यादा हुआ तो दूसरों की गाड़ियां चलाऊंगा।
हां मै मुसलमान हूँ, नेताओ की चमचागिरी, अपने भाइयो की टांग खिंचाई, मेरा अहम शगल है।

आखिर मै क्यों नही पढ़ा? या मै क्यों नही पढ़ पाया? ये सवाल हो सकता है! लेकिन मैं अनपढ़ हूं इसमें शक नही!

हां मै मुसलमान हूं,और हिंदुस्तान में 25 करोड़ हूँ, लेकिन मै ज्यादातर अनपढ़, गरीब, गन्दी बस्तियों में ही हूं, इसका दोष मैं दूसरो पर मढ़ता हूं, मै चाहता हूँ कि मेरे घर आंगन की झाड़ू लगाने भी सरकार आये।

मै मुसलमान हूं, घर के सामने अतिक्रमण करना भी मेरा अहम शगल है, मै पंद्रह फिट की रोड को आठ फिट की करने में भी माहिर हूँ, फिर उस आठ फिट की रोड पर रिक्शा खड़ा करना भी मेरा अधिकार है, *हां मै मुसलमान हूँ, जिसका धर्म ‘पाकी आधा ईमान’, ‘तालीम अहम बुनियाद है’ मानने वाला है लेकिन मै इस पर कभी अमल नही करता।*

मै हमेशा सऊदी अरब, दुबई जैसे देशों की दुहाई देकर अपनी बड़ाइयां करता हूँ, लेकिन मैने हिंदुस्तान में खुद पर कभी कोई सुधार नही किया, न मै सुधरना चाहता हूँ।
हां मै मुसलमान हूं, मै अनपढ़ हूँ, क्योंकि माँ-बाप ने बचपन से गैरेज पर नौकरी से लगाया और मै गरीब घर से हूँ।

*बेहतर तालीम देने के लिए माँ-बाप के पास रुपया नही है, और मेरी कौम तालीम से ज्यादा लंगर को तवज्जो देती है, वो खिलाने मात्र को सवाब समझती है।*

*मैं मुसलमान हूं, मै खूब गालियां देता हूं, मै रिक्शा चलाता हूं, मैं गैरेज पर गाड़िया सुधारता हूँ,मैं चौराहे पर बैठ कर सिगरेट पीता हूं,गांजा पीता हूं, ताश पत्ते खेलता हूं, क्योंकि मै अनपढ़ हूं, और मैं अनपढ़ सिर्फ दो वजह से हूं, एक–माँ-बाप की लापरवाही, दूसरा –कौम की लापरवाही।*
*माँ-बाप मजबूर थे, लेकिन मेरी कौम मजबूर न थी, न है! मैने आंखो से देखा है लाखो रुपयों के लंगर कराते हुए, मैने आँखों से देखा है लाखों रुपए कव्वाली पर उड़ाते हुए, मैने आँखों से देखा है बेइंतहा फ़िज़ूल खर्च करते हुए।*
*काश! मेरे माँ-बाप या मेरी कौम मेरी तालीम की फ़िक़्र मंद होती तो आज मै प्रधान मंत्री या मंत्री न सही, लेकिन मैं आज क्लेक्टर, एसडीएम,कमिश्नर जैसे बड़े पदों पर होता, बिना वोट पाये भी लाल बत्ती में होता, या कम से कम मैं डॉक्टर,इंजीनियर,आर्किटेक्चर,या एक अच्छा बिजनेस मैन तो होता ही, लेकिन बचपन से मन में एक वहम घर कर गया है, “कि मियां तुम मुसलमान हो और मुसलमानो को यहाँ नौकरी आसानी से नहीं मिलती” लेकिन मैं ये तो भूल ही गया कि मेरे नबी ने तमाम जिंदगी तिजारत ही की और तालीम पर अहम् जोर दिया, फिर मै उनका उम्मती होकर नौकरी न मिलने की बात सोच कर तालीमात क्यों हासिल नहीं करता?*

(नोट- दोस्तों ये तहरीर सिर्फ इस्लाही पोस्ट के लिए लिखी गयी है, रिक्शा चला कर पेट पालना या गैरेज के पाने उठाना या मजदूरी करना कोई गलत काम नही, लेकिन हम इसके लिए पैदा हुए है ये सोच कर तालीम हासिल न करना गलत है, खूब पढ़ाई करो, कि हर पद पर सिर्फ तुम दिखो, तुम्हें लोग इज्जत से देखे, तुम पढ़े लिखे तबके में गिने जाओ, अंधविश्वास से दूर एक नयी जिंदगी की ओर…..जहाँ प्रोपोगंडा नामक चीज ही न हो, आने वाली नस्लों को पढ़ा-लिखा कर हम अब तक के अपने इतिहास को बदल दें, यही एक ललक है कि ये कौम एक नया सवेरा देखे, कि जब भी सुबह का अखबार देखे तो हर अखबार के फ्रंट पेज पर आये–
*इस शहर के नए कलेक्टर,नए एसडीएम,नए कमिश्नर तुम हो…….*
ALI HAMMAD.
STUDENT OF DELHI UNIVERSITY