सीतामढ़ी दंगा: प्रशासन और पुलिस कप्तान की भूमिका को लेकर उठते सवाल

तनवीर आलम |सीतामढ़ी|: यूं तो सीतामढ़ी की पवित्र धरती साम्प्रदायिक दंगों के खून से कई बार लाल हुई है और हर बार इस दाग़ को धूमिल होने में दशकों लगे हैं। 1992 के दंगे के बाद लगभग दो दशकों तक शहर का विकास जैसे थम सा गया था। हर बार दंगों की कोई न कोई वजह होती है इसलिए सीतामढ़ी शहर कुछ त्योहारों पर पूर्ण रूप से अति संवेदनशील हो जाया करता है।

विगत कई बरसों में प्रशासन ने अपनी चुस्ती के बल बूते बड़ी घटनाओं पर अंकुश भी लगाया है। पर इस बार 19 और 20 अक्टूबर को हुए खूनी दंगे पूर्ण रूप से प्रशासनिक असफलता की ओर संकेत दिलाते हैं। प्रशासन चाहती तो इस घटना को टाला और रोका जा सकता था। पर प्रशासन ने न सिर्फ काहली दिखाई बल्कि भीड़ को निरंकुश होने दिया। भीड़ 11:00 बजे दिन से दोपहर 3:00 तक उत्पात और खूनी खेल खेलती रही लेकिन पुलिस प्रशासन इस दंगाई भीड़ को काबू करने में नाकाम रही। क्यों?

आईये जानने की कोशिश करते हैं पिछले वर्ष नवादा में मुसलमानो पर पुलिस द्वारा बड़पाये गए कहर को। वहां राम नवमी के अवसर पर पुलिस मुसलमानो के घरों में घुसती है, छोटे दूध पीते बच्चे से लेकर 85 साल की बूढ़ी औरत को मारती है, उत्पात मचाती है, ऐसा इल्ज़ाम लगा कि लूटपाट करती है और नवादा को गुजरात बना देने की धमकी देती है। यहां तक कि नवादा के ही विधान पार्षद सलमान रागिब के घर में घुसकर पुलिस के जवानों ने तोड़फोड़ की, उनके रिश्तेदारों को अधनंगा करके मारा-पीटा। हुआ क्या? कुर्सी बचाने के लिए विधान पार्षद भी चुप। पुलिस कप्तान कौन थे?  यही सीतामढ़ी के मौजूदा पुलिस कप्तान विकास बर्मन। बिहार सरकार फिर भी इनको नवादा से नही हटाती। क्यों? क्योंकि नीतीश कुमार की गोद में बैठे हमारे मिल्ली रहनुमा चूँ तक नही करते। जब सामाजिक कार्यकर्ताओं और नवादा के मुसलमानो ने इमारत-ए-शरिया के ओहदेदारों पर कुछ नही करने और खामोश रहकर सरकार को बचाने का इल्जाम लगाया, हंगामा मचाया और ये खबर अखबारों की सुर्खियां बनी तो उल्टा तरदीदी बयान निकाल दिया कि हमारे मुफ़्ती साहब नवादा गए थे और वहां जाकर रिपोर्ट बनाई है जिसकी बुनियाद पर हमलोगों ने नीतीश कुमार कुमार को इमारत-ए-शरिया की रिपोर्ट सौंपी है। मैंने खुद उस मुफ़्ती से बात की तो उन्होंने वहां नही जाने को स्वीकार किया और ये भी स्वीकार किया कि मैंने कोई ऐसी रिपोर्ट नही बनाई। 

नवादा के मुसलमानो के साथ इतना ज़ुल्म हुआ, कुछ लोगों को छोड़कर हर तरफ खामोशी थी। आज यही खामोशी सीतामढ़ी को लेकर भी है। पुलिस कप्तान यानी एस पी साहब अपनी काली करतूत को शाबाशी में बदलने में लगभग कामयाब हैं। हर तरफ खामोशी है। आखिर ये सवालात क्यों नही उठते:

1. नवादा में मुसलमानो को पुलिस द्वारा प्रताड़ित कराने वाले पुलिस कप्तान को सीतामढ़ी जैसे अति संवेदनशील शहर में पदस्थापित क्यों किया गया?

2. ऐसा शहर जो हमेशा से साम्प्रदायिक तनाव में जीता है वहां डी एम या एस पी दोनों में से एक मुसलमान क्यों नही भेजा जाता?

3. जब इतनी बड़ी घटना हो गयी तो वहां के ज़िम्मेदार प्रशासनिक अधिकारियों को बर्खास्त क्यों नही किया गया?

4. अमीर-ए-शरीयत मौलाना वली रहमानी मुख्यमंत्री, बिहार से मांग क्यों नही करते कि ऐसा पुलिस कप्तान जिसका रिकॉर्ड मुसलमानो और दलितों को प्रताड़ित करने का रहा है उसको तुरंत बर्खास्त कर नया पुलिस कप्तान भेजा जाए?

सीतामढ़ी के हर ज़िम्मेदार नागरिक को इन मांगों का समर्थन करते हुए मुख्यमंत्री से ये मांग करनी चाहिए ताकि शहर में अमन-चैन और आपसी सद्भाव अतिशीघ्र बहाल किया जा सके।

यह लेखक के अपने विचार है