सीतामढ़ी दंगे पर एक संक्षिप्त रिपोर्ट

तनवीर आलम/मिल्लत टाइम्स: सीतामढ़ी और दंगे या दंगे जैसे हालात का चोली-दामन का साथ रहा है। पिछले सप्ताह जो दंगा वहां हुआ इससे पूर्व भी सीतामढ़ी में 1959 और 1992 में बड़े दंगे हो चुके हैं। 1959 के दंगे में ही पूर्व सांसद स्वर्गीय अनवारुल हक़ के पिताजी को शहीद कर दिया गया था। 1992 में भयंकर दंगा हुआ जिसमें कई जानें गयीं। पिछले दशकों से वहां हर दुर्गा पूजा में साम्प्रदायिक तनाव बन जाता है। पिछले वर्ष भी जबरदस्त तनाव बना था और डी एम/ एस पी को स्वयं डंडा लेकर दंगाइयों के बीच कूदना पड़ा था।

इस वर्ष भी दुर्गा पूजा में कुछ ऐसा ही हुआ। प्रशासन के कथित रूप से चौकस रहते भी भी दंगाइयों ने अपना काम कर लिया।
सीतामढ़ी में कुछ मोहल्ले संवेदनशील हैं जिनमें मिरचाईपट्टी, बड़ी बाजार, गौशाला चौक, मुर्लिया चक, मधुबन, राजोपट्टी, मेहसौल और मेहसौल चौक संवेदनशील हैं। गौशाला चौक से लेकर मोहन साह के चौराहे तक का पूरा क्षेत्र अति संवेदनशील है। 1992 में मिरचाई पट्टी में रहने वाले मुसलमानो के 10-15 घर लूट लिए गए थे और जला दिए गए थे। उसी क्षेत्र से लेकर रिगा तक सबसे अधिक हत्याएं हुई थीं जिसका टीस आज भी शहर बर्दाश्त कर रहा है।

इस बार भी शुरुआत मधुबन से हुआ। ये गांव शहर से थोड़ा हटकर दक्षिण की दिशा में स्थित है। बताया जाता है कि वहां के दुर्गा पूजा समिति इस बात बात अड़ी थी कि मूर्ति विसर्जन का जुलूस बीच गांव से होकर जाएगा जो विगत सालों में कभी नही होता रहा है। मूर्ति विसर्जन या ताज़िया के जुलूस को लेकर जाने का एक रूट प्रशासन द्वारा तय हुआ करता है। इस बात को लेकर ग्रामीणों और प्रशासन के बीच दो बार शांति समिति की बैठक हुई और आखिरी मीटिंग मे जो 16 अक्टूबर को हुई थी प्रशासन और ग्रामीणों के बीच तय हुआ कि मूर्ति विसर्जन वाला जुलूस अपने पुराने तयशुदा मार्ग से ही जायेगा यानी गांव में मुसलमानो के मोहल्ले से नही गुजरेगा। गांव वालों का कहना है कि 19 अक्टूबर की रात को मूर्ति विसर्जन का जुलूस निकला जिसने मुसलमानो के मोहल्ले में जहां जुलूस का घुसना वर्जित था घुसने का प्रयास किया। लेकिन प्रशासन के दखल से ऐसा नही हो पाया। गांव वाले बताते हैं कि तीन दिशाओं उत्तर, पश्चिम और दक्षिण से लगभग 1200-1500 लोगों के जुलूस ने जिनके हाथों में लाठी, डंडा, भाला और तलवार था ने हमला किया। गांव की एक झोंपड़ी को आग लगा दी गयी उससे पहले घर के सामानों को लूट लिया। गांव के दूसरे छोर पर एक दूसरे घर में लूटपाट की गई, जानवर खोल कर ले गए और प्रशासन मूकदर्शक बनकर देखती रही। प्रशासन का इतना ही काम था कि भीड़ को गांव में दाखिल नही होने दिया जाए। जुलूस नारेबाजी कर रही थी जो नारे आमतौर पर मुसलमानो के मोहल्ले में घुसने पर लगाये जाते हैं। गांव वालों का आरोप है कि पिछले 2 वर्षों से हमलोगों को तरह तरह से परेशान किया जाता है। पिछले वर्ष ताज़िया के जुलूस को लगभग 500 लोगों ने सड़क के दोनों छोर से घेराबंदी करके जय श्रीराम और मुसलमानो पाकिस्तान जाओ के नारे लगाए गया और पुलिस प्रशासन की 200-300 की टुकड़ी मूकदर्शक बनकर देखती रही।


बहरहाल 19 अक्टूबर की रात को ये जुलूस मधुबन से निकलकर खैरवा रोड होते लगभग 11:00 बजे रात को मुरलिया चक पहुँची जो मुसलमानो का इलाका है। अफवाह उड़ा की मूर्ति पर रोड़ेबाजी हुई है। दोनों समुदायों में थोड़ी बहुत झड़प हुई लेकिन कंट्रोल कर लिया गया।

प्रत्येक वर्ष आमतौर पर शहर की सारी मूर्तियां विसर्जित होने के बाद आखिर में 3-4 जगह की मूर्तियां विसर्जित होती हैं जिनमें मुख्यतः काली अखाड़ा मूर्ति- बड़ी बाजार, मां भवानी पूजा समिति की मूर्ति- जानकी स्थान, दुर्गा दल- कोर्ट बाजार और एक्सचेंज रोड- मिरचाईपट्टी की मूर्तियां होती हैं। और हर बार तनाव इन्हीं में से किसी के विसर्जन के समय बनता है। इस बार भी यही हुआ। 20 अक्टूबर को सुबह से ही गौशाला चौक के आसपास के इलाके में शोर-गुल और अफवाह का बाजार गर्म हो चुका था। सतर्कता के तौर पर पुलिस की 5-7 गाड़ियां भी मौजूद थीं। अफवाह उड़ा की मुसलमानो ने मूर्ति तोड़ दिया। सुबह 10:00 बजे चक महिला की ओर कुछ लोगों ने लूटपाट शुरू की जिससे माहौल बिगाड़ने लगा। स्थानीय विधायक और अतिरिक्त पुलिस दल पहुंचने लगे। लोग बताते हैं कि बड़ी बाजार, जानकी स्थान की मूर्ति के साथ लगभग 2000 का हुजूम जिसमें राजोपट्टी, मिरचाईपट्टी, चक महिला, गौशाला चौक और आसपास के बच्चे, जवान, बूढ़े सब थे मुर्लियाचक की ओर बढ़े। ये हुजूम लाठी, डंडा, भाला और तलवार के साथ थी। मुर्लियाचक में पत्थरबाजी शुरू हो गयी। ये भीड़ पीछे लौटी तो लूटपाट और आगजनी शुरू कर दी। मिरचाईपट्टी के 3 मकानों को आग लगा दिया गया। सड़क की दुकानों, गैरेज की लूटपाट हुई और आग के हवाले कर दिया गया।


लोग बताते हैं कि भोरहां निवासी जैनुल अंसारी की इस हज़ारों की भीड़ ने ज़बह कर हत्या कर दी और बाद में लकड़ी इकट्ठा कर आग लगा दिया। वो अपनी बेटी जो शहर के राजोपट्टी मोहल्ले में रहती है से मिलकर वापस हो रहे थे। वो 11:00 बजे जब अपनी बेटी के यहां से निकले तो लोगों ने मना किया कि माहौल खराब है मत जाएं। लेकिन उन्होंने कहा कि 5 किमी तो जाना है और मैं बुढ़ा आदमी हूँ मुझे कौन क्या करेगा। किसको पता था कि वो मौत की तरफ जा रहे हैं। देखते देखते एक वृद्ध ब्यक्ति जिसका समाज पर पूरा भरोसा था कि उनकी उम्र को देखकर कोई कुछ नही करेगा उनकी निर्मम हत्या कर दी गयी। गौशाला में हर रविवार के दिन मवेशियों के बाजार लगता है और दूर दराज से ब्यापारी खरीद-बिक्री करने आते हैं। लोगों का कहना है कि उन ब्यापारियों के मवेशियों को लूट लिया गया। इनमें से कुछ ब्यापारियों की भी हत्या की जाने की आशंका है जताई जा रही है जिसकी पुष्टि अभी तक नही हो पायी है। अगले बाज़ार को जब ब्यापारी आएंगे तभी सही स्थिति का पता चल पाएगा कि कौन सुरक्षित है और कौन गायब? ये वही बाजार है जहां चैती मेला भी लगता है और उसी मेले में 1959 में दंगा हुआ था।

बहरहाल उसके बाद प्रशासन ने स्वर्गीय जैनुल अंसारी की लाश को मुजफ्फरपुर एस के एम सी एच भेज दिया। लाश की पहचान नही हो पा रही थी। 20 अक्टूबर को जब वो घर नही पहुंचे तो घर वालों ने शाम तक खोजबीन शुरू की। 21 अक्टूबर को सुबह रिगा थाने में गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखाई गयी। प्रशासन से राब्ता होने पर डी एम ने लाश की शिनाख्त करने को घरवालों को मुजफ्फरपुर भेजा फिर भी लाश को पहचाना नही जा सका। परिजन घर वापस आ गए। लेकिन जैसे ही नेटवर्क चालू हुआ वो हत्या करते हुए फ़ोटो वायरल हो गया। उसकी बुनियाद पर परिजनों ने काश की पहचान की। प्रशासन के आश्वासन और मुजफ्फरपुर डी एम के समझाने बुझाने पर मुजफ्फरपुर मेडिकल मदरसा में स्वर्गीय जैनुल अंसारी का जनाज़ा हुआ और वहीं क़ब्रिस्तान में उन्हें दफना दिया गया।

हत्या, आगजनी और लूटपाट के मामले में प्राथमिकी दर्ज हुई। हत्या के मामले में 10 गिरफ्तारियां अब तक हुई हैं। कुल गिरफ्तारियों की संख्या लगभग 50 बताई जाती है। अब कुछ सवाल प्रशासन पर उठता है:

1. जब प्रशासन को मालूम था कि गौशाला का क्षेत्र अति संवेदनशील है, 19 अक्टूबर की रात को झड़प हो चुकी है तो प्रशासन चौकस क्यों नही थी?

2. 2000 की भीड़ प्रशासन की मौजूदगी में एक वृद्ध ब्यक्ति की हत्या करती है, उसकी लाश को जलाती है और प्रशासन मूकदर्शक बनी देखती रहती है, इसका क्या अर्थ है?

3. 19 अक्टूबर की रात को ही माहौल खराब हो गया, इसके पूर्व में दंगे उसी क्षेत्र से शुरू होते रहे हैं तो प्रशासन ने मूर्ति विसर्जन रात में ही क्यों नही कराई, धारा 144 क्यों नही लगया, प्रशासन का खुफिया तंत्र क्या कर रहा था?

4. मधुबन जहां पिछले ताज़िया को 200-300 के जवानों और अफ़सरों की उपस्थिति में नारेबाजी हुई, जुलूस को रोका गया उसमें दोषियों के ऊपर कार्रवाही क्यों नही हुई? दुर्गा पूजा में 1200-1500 लोगों की भीड़ कहाँ से आई, उन्हें बेलगाम क्यों छोड़ा गया कि उन्होंने आगे जाकर अफवाह फैलाई? प्रशासन का खुफिया तंत्र क्या कर रहा था?

5. मधुबन में होनेवाली लूटपाट और आगजनी की अबतक प्राथमिकी क्यों दर्ज नही हुई और गिरफ्तारियां क्यों नही हुईं?

अब तक बहुत सारी कड़ी की छानबीन होना बाक़ी है। बहुत सारे प्रश्न सीतामढ़ी के प्रशासन पर उठने बाक़ी हैं। आवश्यकता है सिविल सोसाइटी अपने स्तर पर इसकी खोज खबर लें। अभी स्थिति नियंत्रण में है पर सीतामढ़ी के गर्भ में बहुत कुछ छुपा हुआ है। इसपर आगे बढ़कर दोनों समुदायों के लोगों को सोचना होगा। आरोपियों को सज़ा दिलानी होगी। प्रशासन क्या कर रही है, आरोपियों पर कौन कौन सी धाराएं लगी हैं इसकी पड़ताल करनी होगी। न्याय सुनिश्चित करना होगा और जिनलोगों के जान-माल की क्षति हुई है उसकी भरपाई करानी होगी।
वरना हर वर्ष एक भीड़ तैयार होगी, हत्या करेगी, लूटपाट मचाएगी और सीताजी की जन्मस्थली को कलंकित करेगी।

उसके क़त्ल पे मैं भी चुप था मेरा नंबर अब आया,
मेरे क़त्ल पर आप भी चुप हैं अगला नंबर आपका है।

तनवीर अलाम

नोट: यह रिपोर्ट दंगा ग्रस्त क्षेत्र के लोगों से बातचीत के आधार पर समझ बनाकर लिखी गयी है। किसी तरह की जानकारी में त्रुटि होने पर सुधार किया जा सकता है।