बकरईद का संदेश

mudassir-qasmiमुददस्सीर अहमद क़ासमी

जिस तरह एक जीवित व्यक्ति के लिए शरीर और आत्मा का एक साथ मौजूद होना ज़रूरी है इसी तरह अल्लाह के पास किसी काम के स्वीकार्य होने के लिए उस काम का जितना शारीरिक रूप से करना आवश्यक है उतना ही उस प्रक्रिया के पीछे मौजूद जज़्बे की उपस्थिति भी अनिवार्य है। उदाहरण के तोर पर, नमाज़ के लिए यह जरूरी है कि इसमें रुकू , सजदह , उठना और बैठना भी हो और साथ ही अल्लाह को खुश करने की भावना भी हमारे दिल मैं हो, दूसरे शब्दों मैं दोनो एक दूसरे के लिए अविभाज्य हैं। अब अगर कोई अल्लाह के आदेश को पूरा करने और अल्लाह को खुश करने के भावनाओं से खाली होकर सिर्फ रुकू , सजदह , उठना और बैठना करता है तो उसे सही नमाज़ नहीं कहा जाएगा, साथ ही अगर कोई अल्लाह के आदेश को पूरा करने और अल्लाह को खुश करने के लिए सिर्फ नमाज़ की नियत करता है और रुकू , सजदह , उठना और बैठना नहीं करता हे तो उसे भी नमाज़ का दर्जा प्राप्त नहीं होगा। ये मानदंड दुनिया और धर्म के सभी कार्यों के लिए है। यहां हमें यह समझना है कि हम बकरईद के अवसर पर जो पशु की क़ुरबानी पेश करते हैं उसके भी दो पहलू हैं। (1) शारीरिक रूप से पशु की क़ुरबानी (2 ) आज्ञापालन और अल्लाह को खुश करने का जज़्बा।

पहले नंबर की व्याख्या यह है कि अगर हम इस्लामी उसूल के हिसाब से क़ुरबानी करने के अहल हैं तो हमारे लिए आवश्यक है कि हम जानवरों की क़ुरबानी करें। इस अवसर पर हम यह कह कर अपना पल्ला नहीं बचा सकते कि हम जानवर की कुर्बानी के बजाय दान करके माल की कुर्बानी दे देते हैं, क्योंकि इस विशेष अवसर पर पशु की कुर्बानी ही आवश्यक है और इसी पर अल्लाह तआला की खुशी का परवाना सुनाया गया है। तिर्मिज़ी शरीफ की हदीस है कि नबी अकरम (ﷺ) ने फरमाया कुर्बानी का खून जमीन पर गिरने से पहले अल्लाह तआला के नज़दीक क़बूल हो जाता है, इसी लिये तुम खूशी खूशी क़ुरबानी करो। यहाँ से यह बात बिल्कुल स्पष्ट हो गई कि क़ुरबानी की पुण्य प्राप्त करने के लिए पशु की क़ुरबानी ही अनिवार्य है, क्योंकि माल की क़ुरबानी में हदीस वाली बात नहीं पाई जाती। इसी तरह इस विशेष अवसर पर विशेष रूप से पशु की क़ुरबानी का अगर मांग न होता तो नबी अकरम (ﷺ) यह नहीं कहते कि: “जिस व्यक्ति में क़ुरबानी करने की शक्ति हो और फिर वह क़ुरबानी न करे तो ऐसा व्यक्ति हमारे ईदगाह में उपस्थित न हो (अहमद) । वास्तव में बकरईद में अल्लाह तआला के लिए पशु की क़ुरबानी प्रतिबद्धता के नवीकरण के लिए है और वह यह कि जिस तरह पैग़म्बर इब्राहिम अलैहिस्सलाम अल्लाह के आदेश को मानने मैं अपनी प्यारे वस्तु को भी कुर्बान करने से नहीं हिचकिचाए हम भी इसी तरह पशु की क़ुरबानी करके इस प्रतिबद्धता को दोहराएं कि ऐ अल्लाह हम भी आपकी फ़रमाँबरदारी मैं किसी बलिदान से संकोच नहीं करेंगे।

क़ुरबानी का दूसरा पहलू अपने अंदर आज्ञापालन और अल्लाह की खूशी के लिए काम करने की भावना पैदा करना है। क़ुरबानी के अंदर यही वह पहलू है जिसकी वजह से इस प्रक्रिया को क़यामत तक आने वाले सभी मनुष्यों के लिए एक यादगार बना दिया गया और इससे यह स्पष्ट हो गया कि आपकी जीवन का मक़सद अल्लाह के आगया का पालन करना ही है। यहाँ से हमारे लिए यह समझना बिलकुल आसान हो गया कि बकरईद के अवसर पर क़ुरबानी करना सिर्फ  एक रस्म निभाने के लिये नहीं बल्कि यह एक महान उद्देश्य के लिए है। इसलिए कुरान मजीद के सूरतुल हज की आयात 37  मैं अल्लाह तआला ने यह घोषणा कर दिया है: “अल्लाह के पास न इन जानवरों का मांस पहोंचता है और न उनका रक्त, बल्कि उसके पास तो तुम्हारा तक़वा पहोंचता है। अगर केवल शारीरिक रूप से पशु की क़ुरबानी देना काफी हो जाता तो इस आयत में सच्चा जज़्बा यानि तक़वा हासिल करने की बात न होती। ये बात अत्यंत खेद कि है के आज हम में से कुछ लोग महज रस्म निभाने के लिए क़ुरबानी करते हैं जो क़ुरबानी के आत्मा के खिलाफ है। सितम पर सितम ये कि क़ुरबानी में प्रदर्शित की भावना ने हमें क़ुरबानी के लक्ष्य से काफी दूर कर दिया है। आज एक बड़े वर्ग का आलम यह है कि वह दूसरों को मात देने के लिए क़ुरबानी के पशु खरीदते हैं और यह कहते नजर आते हैं कि मेरा जानवर उसके जानवर से बड़ा और बेहतर हे। ये सच हे के क़ुरबानी के लिए बेहतर से बेहतर जानवर खरीदना इस्लाम मैं पसंदीदा काम है लेकिन केवल प्रदर्शन के लिए ऐसा करना शरीयत की नज़र मैं निषेध और ऐब वाली बात है। क़ुरबानी तो किया, दिखलावा किसी भी प्रक्रिया में वैध नहीं। क़ुरबानी के पशुओं में प्रदर्शनी का यह जज़्बा कई समस्या को जन्म देता है, पहले तो हमारा सवाब ख़तम होजाता है  और फिर इससे दूसरों का दिल तोड़ना होता है। इस का सबसे खतरनाक पहलू हमारे बच्चों के अंदर प्रदर्शनी और दिखलावा की भावना पैदा होना है, इसका परिणाम यह होगा कि जब ये बच्चे बड़े होकर क़ुरबानी के जानवर खुद खरीदेंगे तो उनके अंदर इस बुराई का पाया जाना निश्चित है। इसलिए हमारी यह जिम्मेदारी है कि हम भविष्य बनाने और संवारने के लिए प्रदर्शनी और दिख्लावे की भावना को पनपने ही न दें।

अच्छी बात यह है कि मुसलमान जीवन के अन्य क्षेत्रों में कमियों के बावजूद, पैग़म्बर इब्राहिम (अ स) के क़ुरबानी के तरीके को अपनाए हुये है, बस जरूरत इस बात की है कि जिस तरह हम पशु की क़ुरबानी देते हैं उसी तरह हम अपनी इच्छाओं की भी क़ुरबानी देने वाले बन जाएं। मुझे उम्मीद ही नहीं बल्कि विश्वास है कि अगर हमारे अंदर क़ुरबानी की यह भावना जागृत हो गया तो हमारे बहुत सारे मुद्दे इसी से हल हो जाएंगे। अपनी इच्छाओं का त्यागने का व्यावहारिक अभ्यास हम ईदुल-अज़हा के दिन से शुरू कर सकते हैं, वे इस तरह से है कि शरीयत इस्लामिया ने क़ुरबानी के मांस को बाँटने का जो तरीका बतलाया है उसे मुकम्मल तरीके पर अपनाते हुए रिश्तेदारों और गरीबों का हिस्सा निकाल दें। हालांकि शरीयत में मांस की तक़सीम को अनिवार्यता का दर्जा नहीं दिया गया है, इसलिए आप के लिये यह विकल्प है कि इसमें से जितना चाहें उपयोग कर लें लेकिन यह क़ुरबानी की भावना के खिलाफ जरूर है, क्योंकि इस प्रक्रिया से अपनी इच्छाओं का ख़तम न करने तक बात पहुँचती है जो क़ुरबानी के मक़सद यानि तक़वा के खिलाफ है। इसके अलावा हमारे लिए क़ुरबानी का संदेश यह है कि जिस तरह एक बूढ़ा पिता हज़रत इब्राहीम (अ स) अपने प्यारे बेटे हज़रत इस्माईल (अ स) को अल्लाह तआला के हुक्म पर क़ुर्बान करने के लिये खूशी से राज़ी होगए, इसी तरह हम भी अपनी पियारी चिजों को अल्लाह की खूशी के लिये दोसरों के लिये क़ुर्बान कर देने वाले बन जाएं।

ईदुल-अज़हा के अवसर पर हमें इस बात का भी ध्यान रखना है कि हमारी क़ुरबानी वाली प्रक्रिया किसी के लिए भी दुख का कारण न बने इसलिए हम क़ुरबानी के पशुओं को ज़बह करने के लिए विशेष स्थान का चयन करें ताकि वह देशवासि जो इस प्रक्रिया को देखना नहीं चाहते उनकी नज़रों से हमारा यह प्रक्रिया ओझल रहे। हमारा यह प्रक्रिया क़ुरबानी के लक्ष्यों को प्राप्त करने में मददगार साबित होगा। इसी तरह क़ुरबानी के पशुओं के वो हिस्से जो उपयोग में नहीं आते उन्हें हम आम रास्तों पर न फेकें, इससे जहां गंदगी फैलेगी वहीं ये आम लोगों के लिए पीड़ा का कारण बनेगी। इस्लाम की सुन्दरता यह है कि जहां पवित्रता और सफाई मुसलमानों के लिए अनिवार्य करार दिया है वहीं इस बात की भी शिक्षा दी है कि ऐसे स्थानों को गंदा न करें जो आम लोगों के उपयोग में आती हैं अब चाहे वह आम सड़क हो, छायादार जगह हो या तालाब हो। अगर हम ईदुल-अज़हा के मौके पर सफाई पर विशेष ध्यान देते हैं तो यह भी हमारे लिए एक बड़ी कुर्बानी होगी जो इस्लाम धर्म की अहम् तालीम है। आइए हम यह संकल्प करें कि इस विशेष अवसर पर हम अल्लाह तआला की खुसी हासिल करने के लिये क़ुरबानी करेंगे और अल्लाह के बन्दों की भलाई के लिए अपनी इच्छाओं की भी क़ुरबानी देंगे।

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