बनारस में कौमी एकता का महासम्मलेन, गूढ़ प्रश्नों पर खामोश रहे वक्ता

Millat Times

वाराणसी: कल बनारस में कौमी-एकता को लेकर एक बड़ा कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें नगर और देश के बड़े मौलवियों, धर्मगुरुओं और महंतों ने शिरकत की. इस ‘कौमी यकजहती सर्वधर्म एकता महासम्मेलन’ का आयोजन बनारस स्थित अस्थायी हज हाउस में किया गया था.

तयशुदा वक़्त से तकरीबन दो घंटों की देर से शुरू हुए इस कार्यक्रम में जमीअत उलमा-ए-हिन्द के अध्यक्ष मौलाना सैयद अरशद मदनी, बनारस के प्रसिद्द संकटमोचन मंदिर के महंत पं. विश्वम्भरनाथ मिश्र, काशी विश्वनाथ मंदिर के महंत कुलपति तिवारी, बनारस के शहर मुफ़्ती अब्दुल बातिन नोमानी और वैज्ञानिक प्रो. बी.डी. त्रिपाठी उपस्थित थे. आयोजन का प्रमुख दारोमदार बनारस की एक रामलीला समिति के जिम्मे थे, जिसके सदस्य कार्यक्रम शुरू होने के पहले मंच से जो वक्तव्य दे रहे थे, उससे यह साफ़ हो रहा था कि कार्यक्रम की रूपरेखा सेकुलर और कट्टरपंथ की भर्त्सना करने वाली है.

जमीअत उलमा-ए-हिन्द के अध्यक्ष मौलाना सैयद अरशद मदनी ने कहा, ‘देश में कुछ लोग धर्म के नाम पर भगवा कपड़े पहनकर नफरत फैलाने का काम कर रहे हैं. ये लोग धर्म के नाम पर राष्ट्रीय एकता को ख़त्म करने का प्रयास कर रहे हैं.’ साम्प्रदायिक सद्भाव की बात करते हुए उन्होंने कहा, ‘हमारा देश दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है, जहां सभी धर्मों के अनुयायी सदियों से प्रेम, शांति और एकता से रहते आए हैं. कभी धर्म ने दूसरे धर्म से नफरत नहीं की. इसका हमेशा राजनीतिक फायदा उठाया जाता रहा है. अफसोस और दुर्भाग्य है कि अब कुछ सांप्रदायिक तत्व मानवता और भाईचारे को एक ओर रखकर देशवासियों पर कट्टरपंथी विचारधारा थोपने पर उतारू हैं. संसद के लिए चुने गए लोग भी जनता की सेवा करने के बजाय धार्मिक चोला पहनकर अपने राजनीतिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए सक्रिय हैं और जनता में नफरत के बीज बोकर उन्हें राजनीतिक और सामाजिक रूप से विभाजित करके राष्ट्रीय एकता को कमजोर करने के प्रयासों में लगे हुए हैं.’

बीते कई दिनों से बनारस में धार्मिक सद्भाव को लेकर सरगर्मी बढ़ी हुई है. आगामी विधानसभा चुनावों के परिप्रेक्ष्य में भी देखें तो समाजवादी पार्टी, भाजपा और बसपा ने साम्प्रदायिक समीकरणों को साधने की चालें चलनी शुरू कर दी हैं. कांग्रेस इस मामले में अभी भी फिसड्डी नज़र आ रही है. अभी ख़त्म हुए संकटमोचन संगीत समारोह में भी ऐसी परिस्थितियां बनती दिखायी पड़ रही थीं, जिसमें संगीत से ज़्यादा धर्म की बात हो रही थी.

मौलाना मदनी ने कहा, ‘आज इस शहर बनारस से हम यह संदेश देना चाहते हैं कि एकता और सद्भाव के खिलाफ षड्यंत्र रचने वालों के नापाक मंसूबों को कामयाब नहीं होने दिया जाएगा.’

मौलाना सैयद अरशद मदनी ने गंगा-जमुनी संस्कृति की तहज़ीब पर ज़ोर दिया और इस बात के संकेत दिए कि बनारस शहर की तहजीब को सर्वोपरि रखते हुए पूरे देश में कौमी एकता की बुनियाद को मजबूत करना होगा. उन्होंने कहा कि भारत की अखंडता सर्वधर्म एकता में ही निहित है.

चूंकि अक्सर सेफ-प्ले करने के लिए साम्प्रदायिक सद्भाव के कार्यक्रमों में व्यक्तियों के नाम भाषणों में नहीं लिए जाते हैं, इसलिए इस परम्परा का पालन करते हुए मूलरूप से उत्तरदायी लोगों का नाम नहीं लिया गया और संकेतों के ज़रिए लगभग सारी बात कह दी गयी.

मौलाना मदनी ने कहा, ‘आज देशभर में भय और आतंक का माहौल है. देश की स्वतंत्रता के बाद से अब तक सांप्रदायिकता का ऐसा नंगा नाच पहले कभी नहीं हुआ. अतीत में इतने गंभीर हालात कभी पैदा नहीं हुए. देश में साम्प्रदायिक शक्तियां आए दिन कभी कॉमन सिविल कोड, कभी घर वापसी तो कभी लव जिहाद जैसे मुद्दे खड़ी करती रहती हैं लेकिन यह तमाम मुद्दे सप्ताह-पंद्रह दिन में दम तोड़ देते हैं क्योंकि देश की अधिकतर जनता धर्मनिरपेक्ष है’ फाशीवाद का प्रचलित और पुराना नारा देते हुए मौलाना मदनी ने कहा, ‘देश फाशीवाद की गिरफ्त में चला गया है इसलिए जरूरी है कि संविधान और धर्मनिरपेक्षता में विश्वास रखने वाले राजनीतिक, सामाजिक संगठन और अन्य संस्थान सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ एकजुट होकर उनके नापाक इरादों को विफल करने का प्रयास करें क्योंकि अगर संविधान और कानून का शासन नहीं होगा तो यह देश की अक्षुण्णता भंग हो जाएगी.’

असल लड़ाई के दोनों पक्षों की सही परिभाषा देते हुए मौलाना मदनी ने कहा, ‘जमीअत उलमा-ए-हिन्द देश के हर नागरिक से अपील करती है कि झूठे और भ्रामक प्रचार का शिकार न हों और देश की स्थिति को बेहतर बनाने में अपनी भूमिका निभाएं. हमें यह जानना होगा कि असल लड़ाई हिन्दू और मुसलमान में नहीं है, बल्कि असल लड़ाई कट्टरपंथ और धर्मनिरपेक्षता में है.’

प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर के महंत कुलपति तिवारी ने प्रधानमंत्री का नाम लिए बिना कहा कि वे ‘सबका साथ-सबका विकास’ के नारे को सक्रिय बनाने के लिए काम करें, गंगा तो हम हिंदू और मुसलमान मिलकर साफ कर लेंगे.

संकटमोचन मंदिर के महंत विश्वंभरनाथ मिश्र ने कहा कि एकता विरोधी ताकतें कितना भी प्रयास क्यों न कर लें, काशी की धरती अपनी एकताप्रधान संस्कृति को बिखरने नहीं देगी. महंत मिश्र ने बीते दिनों के रोचनामचे पर कहा, ‘जब भारत माता की जय बोलने की आवश्यकता थी तबतो उन्होंने भी नहीं बोला. अब बोलने से क्या लाभ और केवल ज़बान से जय बोलने से होगा? बनारस के लोग साम्प्रदायिक शक्तियों के छलावे में नहीं आएँगे.’

संचालन के दौरान लोगों ने कहा कि सिर्फ ‘मन की बात’ करने से कुछ नहीं होने वाला है, लोगों के मन से जुड़ना भी होगा. इस आयोजन की पृष्ठभूमि में बनारस का पुराना जुमला ‘काशी से क़ाबा तक’ चमक रहा था. कार्यक्रम में कौमी एकता पर ढेर सारी बातें हुईं और जिन्हें श्रोताओं ने बेहद खूबसूरती से सराहा भी. लेकिन अभी भी देश के दोनों बड़े धर्मों में वंचित तबकों के उत्पीड़न और यातनाएं हो रही हैं, जिनकी तादात धार्मिक हिंसा से कहीं ज्यादा है. इस महासम्मलेन में इस जातिगत हिंसा और उत्पीड़न पर कमोबेश हर वक्ता शांत रहा. दरअसल कौमी एकता को काबिज़ करने की जल्दबाज़ी में हम ये देखना अक्सर भूल जाते हैं कि एक कौम में ही कई सारी स्थापनाएं ऐसी हैं, जिनका निवारण कौमी एकता लाने के पहले करना होगा.

 

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