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इम्तियाज़ हसन
‘सूफ़ीवाद’ या ‘तसव्वुफ़’ एक तरह का इस्लामिक रहस्यवाद है. हालांकि ग़ैर-मुस्लिम समाज के लोग इसे इस्लाम का ही एक पंथ या धारा मानने की ग़लती कर बैठते हैं.
‘सूफ़ीवाद’ इस्लाम का एक पहलू है. सूफ़ीपंथी शिया और सुन्नी दोनो फ़िरक़ों या इस्लाम मज़हब के मानने वाले दूसरे समुदायों में भी मिल सकते हैं.
14वीं शताब्दी में एक अरब इतिहासकार इब्न-ए-ख़लदुन ने सूफ़ीवाद को कुछ इस तरह से परिभाषित किया है, “दौलत, शोहरत, तमाम तरह की दुनियावी लज्ज़तों से खुद को दूर करके अपने रब से लौ लगाना और उसकी इबादत करना ही सूफ़ीवाद है.” इब्न-ए-ख़ुलदान की सूफ़ीवाद की ये परिभाषा आज के दौर में भी एकदम सटीक बैठती है.
सूफ़ियों का ज़ोर अक्सर इस बात पर रहता है कि इस्लामी तालीम सिर्फ़ किताबें पढ़ कर हासिल नहीं करनी चाहिए. बल्कि उसे अपने उस्तादों से सीखना चाहिए. ताकि इस्लाम मज़हब की सही जानकारी और इबादत का सही तरीक़ा पता चल सके. हालांकि इस तरह के पंथों की शुरुआत हज़रत मोहम्मद के ज़माने में ही हो गई थी.
इस्लामी विचार :
हदीसों और क़ुरान की आयतों की रोशनी में गुरु अपने शागिर्दों को हज़रत मोहम्मद के किरदार की खूबियां बताते थे. अपने गुरुओं की मदद से वो भी हज़रत मोहम्मद की शख़्सियत की खूबियों से रूबरू होते थे और उन्हें अपनाते थे. हालांकि सूफ़ियों की तादाद बहुत ज़्यादा नहीं है.
लेकिन इस्लामी विचार और इतिहास को एक अलग रूप देने में उनका बड़ा योगदान रहा है. मिसाल के लिए रूमी, उमर ख़य्याम और अल-ग़ज़ाली जैसे बड़े शायरों ने अपने सूफ़ियाना कलाम के ज़रिए इस्लामी विचारों को पश्चिमी देशों तक फैलाया.
पश्चिम के दार्शनिकों, लेखकों और धर्मशास्त्रियों पर इनके विचारों का इतना गहरा असर पड़ा कि उन्होंने अपनी क़िताबों में इन शायरों के विचारों का ज़िक्र किया. दरअसल, सूफ़ीपंथ के मानने वालों ने इस्लाम मज़हब को इस्लाम की सरज़मीं यानी मध्य पूर्व से लेकर भारत, अफ़्रीक़ा और सुदूर पूर्व तक फैलाया.
अल्लाह की इबादत :
सूफ़ी शब्द कहां से आया, इसे लेकर तरह-तरह की बातें कही जाती रही हैं. कोई कहता है कि इस लफ़्ज का ताल्लुक़ ‘पवित्रता’ से है. कोई कहता है ये शब्द ‘ग्रीक’ भाषा के शब्द ‘सोफ़िया’ से लिया गया है, जिसका मतलब है ‘अक़लमंदी’ या ‘समझदारी’. वहीं कुछ का ये भी मानना है कि जितने भी सूफ़ी थे वो ‘ऊनी’ कपड़े पहनते थे.
हो सकता है ऊन के उसे रेशे से इस शब्द का संबंध हो. बहरहाल, सूफी लफ़्ज़ कहीं से भी आया हो, लेकिन सूफ़ी उस शख़्स को कहा जाता था जिसका ताल्लुक़ तमाम दुनियावी हसरतों और ख्वाहिशों से दूर सिर्फ़ अल्लाह से होता था. वो सभी अपनी ज़िंदगी का मक़सद क़ुरानी आयातों में बताए गए अर्थों में समझते थे.
जैसे क़ुरान में एक आयत में कहा गया है, “मैंने (अल्लाह) जिनों और इंसान को इसलिए बनाया है, ताकि वो सिर्फ़ मेरी इबादत कर सकें.” अल्लाह की इबादत के इसी मक़सद को हासिल करने के लिए हज़रत मोहम्मद के गुज़र जाने के कुछ सदियों बाद तरीक़ों की शुरुआत हुई.
पैगंबर मोहम्मद :
इनका अल्लाह से रूबरू होने या उसकी इबादत करने का अपना तरीक़ा था. तरीक़ों या सूफ़ियों के समूह. हर तरीक़े के एक उस्ताद होते थे, जो बाक़ी सदस्यों को अल्लाह की बातें बताते थे. कैसे ख़ुद को ख़ुदा की इबादत में डुबोया जाता है, इसकी तालीम लोगों को देता था. इसी तरीक़े या पंथ को ‘सूफ़ीवाद’ कहा जाने लगा.
सूफ़ीपंथ का इतिहास काफ़ी लंबा और पुराना है. लेकिन हाल के वक़्त में मुस्लिम समाज के कुछ ग्रुप इस पंथ की ज़रूरत पर सवालिया निशान लगाने लगे हैं. उनके मुताबिक़ सूफ़ियों की इबादत का तरीक़ा खुद पैगम्बर मोहम्मद के लिए अनोखा था. उनके मुताबिक़ पैगम्बर साहब ने कभी भी इस तरह के तरीक़े को नहीं माना था.
हालांकि सूफ़ीपंथी भी इस बात को मानते हैं कि पैग़म्बर मोहम्मद के ज़माने में सूफ़ीपंथ जैसी कोई चीज़ नहीं थी. लेकिन अपने हक़ में वो दलील देते हैं कि हज़रत मोहम्मद, उनके साथी और उनके वारिस, यहां तक कि शुरुआत की तीन पीढ़ियों के लोग भी इबादत के ऐसे ही तरीक़े में रचे बसे थे. लेकिन उन्हें कोई ख़ास नाम नहीं दिया गया था.
पैगम्बर की मौत के बाद की पीढ़ियां दुनियादारी में ज़्यादा पड़ गईं और अल्लाह से उनकी दूरी बन गई जबकि कुछ लोग बाद तक भी अल्लाह की उसी तरह से भक्ति करते रहे और इबादत में मशग़ूल रहे. और उन्हों ने ख़ुद को नाम दिया ‘सूफ़ी’. हालांकि वो लोग अक्सरियत में थे.
सूफ़ीवाद के वजूद में आने की इसी बात को दसवीं सदी में अबु-अल-हसन फुशानजी ने कुछ इस तरह से बयान किया है, “आज सूफ़ीवाद बिना किसी सच्चाई के एक नाम है, एक वो दौर था जब सूफ़ीवाद बिना किसी नाम के एक सच्चाई था.” हालांकि मोहम्मद साहब की तक़रीरों में भी सूफ़ीपंथ का कोई ज़िक्र नहीं है.
लेकिन सूफ़ीवाद का ज़िक्र उनकी बातों में मिलता है. जैसे पैगम्बर मोहम्मद के एक क़रीबी साथी उमर इब्न-अल-ख़त्ताब कहते हैं, “एक दिन हम हज़रत मोहम्मद के साथ बैठे हुए थे. तभी काले बालों वाला, सफ़ेद लिबास में एक शख़्स हमारे सामने नमूदार हुआ. उसके चेहरे पर सफ़र की थकान बिल्कुल भी नहीं थी. हममें से कोई भी उसे नहीं पहचान पाया. वो शख़्स मोहम्मद साहब के सामने घुटनों के बल बैठ गया और कहने लगा “मोहम्मद साहब मुझे इस्लाम के बारे में जानकारी दीजिए.”
अल्लाह और रसूल :
हज़रत मोहम्मद ने कहा, “इस्लाम इस बात की शहादत यानी गवाही देता है कि अल्लाह के सिवा कोई और भगवान नहीं, सभी इबादतें सिर्फ़ उसके लिए हैं. और हज़रत मोहम्मद अल्लाह के दूत हैं. तुम नमाज़ अदा करो, ज़कात दो, रमज़ान के महीने में रोज़े रखो, ये तुम पर फ़र्ज़ हैं. अगर साहिबे हैसियत हो तो हज को ज़रूर जाओ.”
पैगम्बर मोहम्मद की ये बातें सुनकर उस शख्स ने कहा “आपने मुझे सच से रूबरू करा दिया.” इसके बाद उस शख्स ने फिर पूछा, “ऐ मोहम्मद मुझे एहसान के बारे में कुछ बताओ.” पैगम्बर साहब ने कहा, “तुम अल्लाह की इबादत ऐसे करो जैसे तुम उसे देख पा रहे हो. हालांकि वो वहां नहीं है लेकिन तुम उसकी मौजूदगी का एहसास करो. तुम उसे नहीं देख पा रहे हो लेकिन वो तुम्हें देख रहा है.”
इसके बाद इस शख्स ने पूछा ईमान क्या है? मोहम्मद साहब ने जवाब दिया, “अल्लाह और उसके रसूल और उसकी क़िताब यानी ‘क़ुरान’ पर भरोसा ही तुम्हारा ईमान है. क़यामत के रोज़ तुम्हारा हिसाब इसी भरोसे और ईमान पर किया जाएगा.”
सही तालीम :
उस शख्स ने पैगम्बर साहब से कुछ इसी तरह के और भी कई सवाल पूछे और उसके बाद वो शख्स चला गया. उमर अल-ख़त्ताब कहते हैं, “उसके जाने के बाद मोहम्मद साहब ने मुझसे पूछा, उमर क्या तुम उस शख्स को जानते थे?” मैंने कहा- अल्लाह और उसके रसूल से बेहतर और कौन जान सकता है.”
मोहम्मद साहब ने कहा, “वो जिब्रील थे. असल में वो तुम्हारे पास आए थे और मुझसे ये सवाल इसलिए कर रहे थे ताकि तुम्हें इस्लाम की सही तालीम मिल सके”. (सहीह मुस्लिम, बुक 1. नं.1) इस हदीस में हज़रत जिब्रील ने इस्लाम मज़हब की बुनियादी बातों के बारे में जानकारी मांगी थी.
‘इस्लाम’ धर्म का वो रूप है जिसमें मज़हब के फ़र्ज़ अदा किए जाते हैं. ‘ईमान’ अल्लाह और उसके रसूल के बारे में रखे जाने वाले भरोसे का नाम है. यानी जो रसूल ने बताया है, जो सिखाया है, उस पर यक़ीन. ‘एहसान’ उनके नाम पर की जाने वाली इबादत का नाम है, फिर आप चाहें उन्हें देखें या ना देखें. और यही बात सूफ़ीपंथ की बुनियाद है.
पांच बार नमाज :
सूफ़ीपंथ के लोग उस्ताद की ज़रूरत को भी क़ुरान की रोशनी में समझाते हैं. क़ुरान की एक आयत में कहा गया है, “उन लोगों से पूछो जो तुम से बेहतर जानते हैं. और उसी रास्ते को अपनाओ जो मुझ तक पहुंचता है.”
सूफ़ियों को भी पक्का मुसलमान ही माना जा सकता है. वो दिन में पांच बार नमाज़ अदा करते हैं. रोज़े रखते हैं.
यानी इस्लाम के बाक़ी मानने वालों की तरह मज़हब के नियम का पूरी पाबंदी से पालन करते हैं. साथ ही वो आध्यात्म पर भी ज़ोर देते हैं. हालांकि वो पैगम्बर मोहम्मद के नाम ‘ज़िक्र अल्लाह’ को भी जानते हैं. और इसका अनुकरण भी करते हैं. खुदा की शान में वो क़ुरान की आयतों और पैगम्बर मोहम्मद की बातों का भी ज़िक्र करते हैं.
वो कहते हैं ख़ुद क़ुरान में भी कहा गया है कि ख़ुदा का ज़िक्र करने से दिल को सुकून मिलता है. बहुत सारे सूफ़ियो ने आशिक़ों की मिसाल देकर अल्लाह से मोहब्बत में उस हालत को बयान करने के लिए किया है, जो जिक्र के दौरान उन पर तारी हो जाती है.
सूफ़ी संत कहते हैं कि शरीयत को मानने का मतलब मज़हब के जिस्म से ताल्लुक़ है. वहीं ज़िक्र के ज़रिए वो अल्लाह की रूह से रूबरू होते हैं. इस तरह से वो ऊपरी तौर पर तो वो सामान्य दिखते हैं. मगर दिल ही दिल में वो अल्लाह की इबादत के नशे में डूबे होते हैं.
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